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रक्षा बंधन कब मनाएं

 

अक्सर यह सवाल खड़ा हो जाता है की रक्षा बंधन कब मनाया जाना चाहिए. अलग अलग स्थानों पर समय के आलावा तारीख का भी फर्क हो जाता है. इस लेख में मैंने रक्षाबंधन के पर्व का ज्योतिषीय आधार प्रस्तुत किया है.

 

रक्षा बंधन अपराह्नव्यापिनी श्रवण पूर्णिमा में मनाया जाता है| परन्तु भद्रा में यह निषिद्ध है:

“भद्रायाम द्वे न कर्तव्ये श्रावणी फाल्गुनी तथा”|

जब पहले दिन अपराह्न में भद्रा हो, दुसरे दिन पूर्णिमा मुहूर्तत्रय-व्यापिनी हो और वह अपराह्न से पूर्व ही समाप्त हो जाए,  तब दुसरे दिन अपराह्न में रक्षाबंधन करना चाहिए| क्योंकि उस समय पूर्णिमा का अस्तित्व होगा| पुरुषार्थ चिंतामणि कर का वचन है -

 

“यदा द्वितियापराह्नात पूर्वं समाप्ता, तदापि भाद्रयाम द्वे न कर्तव्ये …” इति भद्रायाम निशेधादुत्तरैव| तत्र तिथ्यनुरोधेन  अप्रहनातपुर्वं अनुष्ठाने अप्रहणश्य सर्वथा बधापत्ते:, अपराह्ने ज्योतिष शास्त्र प्रसिद्ध तिथ्यभावेsपि साकल्य – बोधित तिथि सत्त्वात्रैव अनुष्ठानम|”

जब दुसरे दिन पूर्णिमा मुहूर्त-व्यापिनी न हो तब अपराह्न में सकल्यापादित पूर्णिमा भी नहीं होगी| एसी स्थिति में पहिले दिन भद्रा समाप्त होने पर प्रदोष के प्रहर में रक्षाबंधन करना चाहिए. पुरुषार्थ चिंतामणि का ही वाक्य है -

“यदा तुत्तारत्र मुहूर्त द्वय (त्रय) मध्ये किं चित् न्युना पौर्णमाषी तदापराह्ने सर्वथा तदभावत| प्रदोष-पश्चिमो यामौ दिनवत्कर्म चाचरेत इति पराशरात भाद्रन्ते प्रदोष्यामे अनुष्ठानम|”

मतान्तर से धर्मसिन्धुकार आदि कुछ आचार्यों के मतानुसार तिथि के त्रिमिहुर्तव्यपित्व को ही साकल्य प्रोजक माना जाना चाहिए.

पंजाब आदि प्रान्तों में परम्परा के अनुसार रक्षा बंधन के लिए अपराह्न काल को स्वीकार नही किया जाता और मध्याह्न से पूर्व ही (विशेषतया: प्रात: काल में ) ही राखी बंधी जाती है.

लेकिन भद्रा में तो रक्षा बंधन शास्त्रों में सर्वथा वर्जित है.

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  1. रक्षाबंधन की महिमा एवं कथा
  2. Wikipedia Link

हिन्दुओं के चार प्रसिद्ध त्योहारों में से रक्षा बंधन का त्यौहार एक है. यह श्रवण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है. यह मुख्यतः भाई बहन के स्नेह का त्यौहार है. इस दिन बहन भाई के हाथ पर राखी बांधती है और माथे पर तिलक लगाती है. भाई प्रतिज्ञा करता है की यथा सम्भव मैं अपनी बहन की रक्षा करूंगा. एक बार भगवान्  कृष्ण  के हाथ से रक्त बहने लगा था तो द्रौपदी ने साड़ी फाड़कर उनके हाथ पर बाँध दी थी. इसी बंधन से श्री कृष्ण ने चीर हरण के समय दु:शासन से द्रौपदी की लाज बचाई थी.

मध्य कालीन इतिहास में एक ऐसी घटना मिलती है जिसमे चित्तोड़ की रानी कर्मवती ने दिल्ली के मुग़ल बादशाह हुमायूं को राखी भेज कर अपना भाई बनाया था. हुमायूँ ने राखी की इज्जत की और उसके सम्मान की रक्षा के लिए गुजरात के राजा से युद्ध किया.

कथा

प्राचीन समय में एक बार देवताओं और दानवों के बिच घोर संग्राम चला. इस संग्राम में राक्षसों की जीत हुई एवं देवता हार गए. दैत्यराज ने तीनो लोकों को अपने वश में कर लिया तथा अपने की भगवान घोषित कर दिया.

दत्यों के अत्याचारों से क्षुब्ध देवताओं के राजा इन्द्र ने देवगुरु ब्रहस्पति से विचार विमर्श किया और रक्षा विधान करने को कहा.

श्रवण मास की पूर्णिमा को प्रातः काल रक्षा विधान संपन्न किया गया.

येन बद्धोबली राजा दानवेन्द्र महाबल:|

तेन तवामभिबध्नामि रक्षे माँ चल माँ चल||

उक्त मंत्रोच्चार से गुरु ब्रहस्पति ने रक्षा विधान किया. अपनी पत्नी इन्द्राणी के साथ इन्द्र ने ब्रहस्पति की वाणी का अक्षरश: पालन किया. इन्द्राणी ने ब्राह्मण पुरोहितों के द्वारा स्वस्तिवाचन कराकर इन्द्र के दायें हाथ में रक्षा सूत्र की बाँध दिया. इसी सूत्र के बल पर इन्द्र ने दानवों पर विजय प्राप्त की.

श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी पुत्र देने वाली होने के कारण पुत्रदा एकादशी के नाम से प्रसिद्ध है. इस दिन भगवन विष्णु का ध्यान कर वृत्त रखना चाहिए. रात्रि में भगवन की मूर्ति के पास ही सोने का विधान है. अगले दिन वेद पाठी ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देकर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए. इस वृत्त को रखने वाले नि:संतान व्यक्ति को पुत्र रत्न की प्राप्ति अवश्य होती है.

कथा:


प्राचीन काल में महिष्मति नगरी में महिजित नामक राजा राज्य करता था. राजा धर्मात्मा, शांतिप्रिय एवं दानी होने पर भी नि:संतान था. राजा ने एक बार ऋषियों को बुलाकर संतान प्राप्ति का उपाय पूछा. परमज्ञानी लोमेश ऋषि ने बताया कि आपके पिछले जन्म में सावन की एकादशी को आपने तालाब से प्यासी गाय को पानी नहीं पीने दिया था.उसी के परिणाम स्वरुप आप अभी तक नि:संतान हैं. आप श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का नियमपूर्वक वृत्त रखिये तथा रात्रि जागरण कीजिये. इससे आपको पुत्र अवश्य प्राप्त होगा. ऋषि की आज्ञानुसार राजा रानी ने वृत्त किया और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुयी.